The Red Jacket!

By Col Sushil Tanwar

The Original story is in Hindi, English translation is also provided below.

लाल रंग की जैकेट

नींद तो नही आ रही ना तुम लोगो को।

सफेद जिप्सी में बैठते हुए मेजर गौत्तम द्वारा किया गए इस सवाल किया पर गाड़ी के अंदर बैठे दोनों सिपाही एक साथ ही पूरे जोश में बोल पड़े थे।

नहीं साहिब।

लेकिन साथ ही सिपाही नज़ीर अहमद ने हिचकिचाते हुए अपने जवाब में थोड़ा सा फौजी तड़का भी लगा दिया था।

साहिब आपके साथ रह कर सुबह सुबह मार्च करने की आदत हो गई है। शुरू शुरू मे बहुत नींद आती थी लेकिन अब नहीं ।

हां हां ठीक है । ज़िन्दगी में अगर थोड़ी बहुत आशिक़ी कर लेगा तो फिर कभी नींद नहींआएगी।

अपने मेजर साहिब के इस फिल्मी डायलॉग को सुनकर नज़ीर के साथ साथ ड्राइवर रवि भी हंसने लगा था ।

मेजर गौतम की इसी आदत से उनकी यूनिट मे सभी लोग काफ़ी सहज महसूस करते थे। सब से नरम तरीके से बात करना। अपने जवानों का ख्याल रखना। हल्का फुल्का मज़ाक करना लेकिन काम में कोई ढीलाई बरदाश्त नहीं करना। वो सभी बातें जो वैसे तो बहुत साधारण प्रतीत होती है लेकिन जिनके कारण किसी भी फौजी यूनिट में बहुत खुशनुमा और कारगर माहौल बना रहता है।

उस दिन सुबह के तकरीबन पांच बजे थे। कश्मीर की खूबसूरत वादियों में अभी सर्दियों का पूरी तरह आग़ाज़ नहीं हुआ था।

दिन भर चहल पहल से भरा बारामूला शहर अभी गहरी नींद सोया हुआ था। मेजर गौतम की यूनिट पिछले कई सालों से पुराने बारामूला शहर के आखिरी वाले छोर पर तैनात थी।

इस शहर में अमन बनाए रखने की जिम्मेवारी उन्हीं के सिर पर थी। और वो अपने फर्ज को बखूबी अदा भी कर रहे थे। इसके लिए ना सिर्फ आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन करना ज़रूरी था बल्कि उस से कहीं ज्यादा जरूरी था अवाम को अपने साथ मिला कर रखना।

गौतम को जब भी आस पास के इलाकों में जाना होता तो वो अक्सर सुबह सुबह निकल जाता था। आज उसका इरादा ऊरी जाने का था।वैसे तो आमूमन बारामूला से ऊरी जाने में करीब दो घंटे लगते थे लेकिन इस वक्त ट्रैफिक ना होने के कारण ये सफ़र एक घंटे में ही तय हो जाता था।

और इस वीराने में बारामूला से ऊरी तक का खूबसूरत रास्ता और भी हसीन लग रहा था। ऊंची पहाड़ियों की कोख में बसे घने जंगल। ठंडी हवाओं में लहराते बादल और इन सब के बीच हाईवे के साथ साथ बहती हुई झेलम नदी।

इस रास्ते पर आते जाते गौतम अक्सर अपनी सरकारी जिप्सी और झेलम के बीच हो रही किसी दौड़ की कल्पना करता था। लम्बे सुनसान रास्ते में वक्त जाया करने का ये उसका अपना तरीका थ। इस रेस में कभी उसकी गाड़ी आगे निकल जाती तो कभी बेपरवाह बहती झेलम नदी।

दिल बहलाने के लिए ये बचपना ख्याल अच्छा था। वैसे ये मुकाबला एक तरफा था क्यूंकि गौतम की जिप्सी सिर्फ ऊरी शहर तक ही जा सकती थी और झेलम वहां से बहुत आगे पाकिस्तान में भी उसी उमंग से अपना रास्ता पिरोती थी।

मगर किसी भी फौजी के लिए इन कुदरती नज़ारों में गुम जाने से कहीं ज्यादा अहम था अपनी हिफाजत करना। और इसलिए गौतम  और उसके दोनो साथियों की नज़रें सड़क के आस पास के इलाकों पर भी थी।

कोई पता नहीं कब किस तरफ से कोई छुपा हुआ आतंकवादी हमला बोल दे। वैसे तो फौज अपनी खुद की और आने जाने वाली सभी गाड़ियों को हिफाजत के लिए रोड ओपनिंग यानी सड़क के दोनो तरफ सुरक्षा प्रबंध तो करती थी लेकिन वो सब कार्यवाही दिन निकलने के बाद ही होती थी।

इतनी जल्दी सुबह के वक्त तो हर तरफ सिर्फ सन्नाटा था और इसलिए गौतम और उसके साथी बिलकुल सावधान थे।

इसी रास्ते में बसा था बोनियार। वो छोटा सा कस्बा जहां पर आतंकवाद के चरम दौरें मे भी ज्यादातर अमन का ही माहौल बना रहा था। इक्का दुक्का वाकयों के बावजूद फौज और अवाम के दरमियान काफ़ी दोस्ताना तालुककात थे।

लेकिन सब जानते थे कि लाइन ऑफ कंट्रोल के नजदीक होने के कारण पाकिस्तान से घुसपैठ करने वाले आतंकवादी ऊरी और बॉनियार के रास्ते ही कश्मीर की वादी मै दाखिल होते थे।शायद इसलिए वो इस इलाक़े में कोई गड़बड़ नहीं करते थे ताकि सुरक्षा बालों का ध्यान उन पर ना जाए।

Boniyar

थोड़ा धीरे चला भाई ।जल्दबाजी में ऊरी की बजाए अस्पताल मत पहुंचा देना।

गौतम हमेशा को तरह ड्राइवर रवि को समझा रहा था कि तभी उसकी नज़र दूर एक बड़े दरख़्त पर पड़ी। उसको शक हुआ कि शायद वहां कोई है।

उसके इशारे पर रवि ने गाड़ी धीरे की तो गौतम ने ज़रा बारीकी से इलाक़े का नज़री मुआयना किया।

उन्हे कोई और हरकत तो नजर नहीं आई लेकिन उस बड़े से पेड़ के भारी तने से सट कर शायद कोई इन्सान बैठा हुआ था।

इतनी सुबह सुबह सड़क किनारे इस तरह छुप कर बैठे किसी शख्स को देख कर शक करना लाज़िमी था।

नज़ीर देख तो ज़रा। कोई हथियार वगैरह तो नहीं दिख रहा। ज़रा अहितियात बरतना।समझे।

गौतम के इशारे पर सिपाही नज़ीर बड़ी होशियारी से आगे बढ़ा और कुछ कदम चलने के बाद एक दम वापिस लौट आया।

कोई पागल नशेड़ी लगता है साहिब। पता नहीं कहां से आया होगा।

नज़ीर उसी इलाक़े का रहने वाला था। कम रोशनी में भी उसको लोगों की अच्छी खासी पहचान थी। वैसे दिखने में भी वो इन्सान बहुत कमज़ोर और गरीब ही लग रहा था।

ठंड में ठिठुरते हुए वो चुप चाप मुंह नीचे किए बैठा रहा और किसी भी सवाल का जवाब देने कि बजाए उनको बस टक टकी लगा कर देखता रहा। बड़े हुए गंदे बाल और लंबी दाढ़ी में वो बड़ा ही बीमार महसूस हो रहा था।

उसकी इस दयनीय हालत को देख कर गौतम से रहा नहीं गया।

ऐसा कर नज़ीर ये जैकेट उसको दे दे । और बिस्कुट के पैकेट भी रख देना उसके पास।

गौतम की आदत थी अपनी गाड़ी में कपड़े और खाने पीने का सामान रखना। अगर बे वक्त कहीं रुकना पड़ जाए तो फिर कोई ज्यादा  तकलीफ नहीं होती थी।

 नज़ीर हुक्म के अनुसार सब सामान उस इन्सान के पास रखने लगा तब भी वो चुपचाप ही बैठा रहा। शायद सच में वो अपने होश हवास में नहीं था।

उनकी गाड़ी थोड़ी दूर आगे बढ़ी तो नज़ीर से रहा नहीं गया

साहिब बुरा ना मानो तो एक बात कहूं।

और गौतम की अनुमति का इंतजार किए बगैर ही वो फिर बोल पड़ा।

साहिब हमें ऐसे रास्ते में नहीं रुकना चाहिए । पता नहीं कौन कहां से छुप कर वार कर दे। यहां पर किसी के ऊपर कोई भरोसा नहीं है।

गौतम ये सुन कर सिर्फ हल्के से मुस्कुराया था। वो सोच रहा था कि यहीं का रहने वाला नज़ीर उसको यहीं के लोगो पर भरोसा नहीं करने की सलाह दे रहा है। और ठीक ही तो कहा रहा था वो। कश्मीर में पहले भी तो इसी कारण कई हादसे हो चुके थे। धरती पर जन्नत कहे जाने वाले कश्मीर में आतंकवाद के कारण सब से ज्यादा नुकसान  इन्सानियत को ही तो हो रहा था।

चिंता मत करो नज़ीर । हम आसपास के इलाक़े को ध्यान से देखने के बाद ही यहां रुके थे। पर वैसे तुम बिलकुल सही बोल रहे हो। हमें  हमेशा पूरा एहतियात बरतना चाहिए।

इसी तरह बातें करते वो जल्द ही ऊरी पहुंच गए थे। उन दिनो वहां हालात थोड़े संजीदा थे। कुछ महीनों पहले पाकिस्तान से घुसपैठ कर के आए कुछ आतंकवादी एक फौजी कैंप में दाखिल होने में कामयाब हो गए थे  । बदकिस्मती से सोते हुए सिपाहियों के टेंट में बड़ी बर्बरता से आग लगा कर उन्होंने दर्जनों सैनिकों को हमेशा के लिए सुला दिया था।

इस दर्दनाक दुर्घटना के बाद लाइन ऑफ कंट्रोल पर दोनो तरफ से गोलीबारी में तेज़ी आ गई थी। और इसी का फायदा उठा कर पाकिस्तानी फौज आतंकवादियो को सीमा पार भेजने कि कोशिश करती रहती थी।

उस दिन गौतम के ऊरी जाने का मकसद भी यही था। थोड़े दिनो बाद ही बर्फबारी शुरू होने का अंदेशा था और अक्सर आतंकवादी  सर्दियों के मौसम की शुरुआत से ठीक पहले ज्यादा से ज्यादा  घुसपैठ की कोशिश करते थे।

ऊरी इलाक़े के कई लोग फौज के साथ काम करते थे। वो अक्सर फौज से माली मदद जैसे कि पैसे और,राशन वगैरह लिया करते थे। आमतौर पर उनका काम कहीं भी संदिग्ध हरकत होने पर फौज को इतिल्ला करना था। ये अलग बात है कि कुछ लोग तो इस काम को पूरी संजीदगी से करते थे जब की कुछ चालाक लोग फौज के अजनबी होने का फायदा उठा कर  झूठी कहानियां सुनाते।

ऊरी पहुंचते ही गौतम ने तमाम लोगों से मिलने का सिलसिला शुरू किया। वो इसी में मशगूल था कि तभी उसका ध्यान अपने मोबाइल की बजती हुई घंटी की तरफ गया।

हेलो । पहुंच गए क्या।फोन क्यों नहीं किया।पता है कितनी देर से फोन ट्राई कर रही हूं । कितनी चिंता हो रही थी मुझे। वहां सर्दी कैसी है। और कुछ खाया या नहीं।

फोन पर सवालों की बेतहाशा बौछार सुन कर गौतम की हंसी छूट गई।

सॉरी यार। कुछ लोगों से मिलना था । तुम्हे फोन करने का मौका ही नहीं मिला।

जब से सिमरन गौतम की ज़िन्दगी में आयी थी तब से बस यही सिलसिला चल रहा था। हजारों किलोमीटर दूर रहने के बावजूद दोनों एक दूसरे के पल पल की खबर रखते । चूक अक्सर गौतम से होती थी। शायद जानबूझ कर इसलिए भी कि सिमरन की प्यार भरी डांट उसे बहुत पसंद थी।

अच्छा सिम वो याद है तुमने मुझे लाल रंग का जैकेट दिया था।

हां हां बिलकुल याद है। वो मैनचेस्टर युनाइटेड वाला जैकेट। वहीं ना।

हां। यार वो जैकेट आज मैंने रास्ते मे किसी को दे दिया। बेचारा ठंड में बैठा था। मुझसे रहा नहीं गया।

तुम भी कमाल हो । मदर टेरेसा बनने का बड़ा शौक है ना तुम्हे। चलो कोई नहीं। वैसे भी मैनचेस्टर यूनाइटेड आज कल बहुत खराब खेल रही है। परसों ही तो लिवरपूल से कितनी बुरी तरह पिटी है तुम्हारी फेवरेट टीम ।

उसकी इस बात पर गौतम चिडने की बजाए मुस्कुराने लगा था।किसी भी खेल में कोई दिलचस्पी नहीं रखने वाली सिमरन सिर्फ गौतम के कारण फुटबॉल के सभी मैचों का लेखा जोखा रखने लगी थी।

अच्छा अभी रखता हूं। शाम होने से पहले वापिस बारामूला पहुंचना है। बाय बाय।

पूरा दिन गौतम ने ऊरी में गुजारा और देर रात वापिस बारामूला पहुंच गया। उसको यह तो यकीन हो गया था कि जल्द ही उस इलाक़े से आतंकवादी घुसपैठ की कोशिश करेंगे।

और आखिर वही हुआ जिसका अंदेशा था। कुछ दिनों बाद लाइन आफ कंट्रोल पर तैनात एक यूनिट ने रिपोर्ट किया की उनके इलाक़े मे लगी तार किसी ने काटी  हुई है।

बॉर्डर पर  रोज़ सुबह सुबह हर यूनिट अपने इलाक़े में लगी तार का मुआयना करती है। तार कटी मिलने का मतलब साफ होता है कि वहां से घुसपैठ हुई है। इस से फौज को अक्सर अंदाज़ा हो जाता है कि आतंकवादी किस इलाक़े की तरफ जाएंगे और अगर  वक्त पर उस इलाक़े की घेरा बंदी हो जाए तो फिर आतंकवादियो का बच पाना मुश्किल होता है। जब से सन 2001 में लाइन ऑफ़ कंट्रोल पर घुसपैठ रोकने के लिए तार लगाई गई थी तब से हजारों आतंकवादी इसी तरह मारे गए थे।

इस बार भी जैसे ही रिपोर्ट मिली तो फौज ने चारों तरफ सर्च ऑपरेशन शुरू कर दिया था।गौतम ने भी अपने साथ काम करने वाले सभी लोगों को आगाह कर दिया था और वो उनकी  खबर हासिल करने में जुट गया था।

लेकिन आतंकवादियों के इस ग्रुप की शायद किस्मत अच्छी थे।दो तीन दिन गुजर जाने के बाद भी उनका कोई सुराग नहीं मिल रहा था। इसी दौरान ऊपर पहाड़ों में हल्की हल्की बर्फ भी पड़नी शुरू हो गई थी ।

फौज की एक टोली को लच्छीपुरा गांव के पास बर्फ मे पांव के कुछ निशान ज़रूर दिखाई दिए थे लेकिन फिर उसके आगे कोई और  सुराग नहीं  मिलने के कारण फौज ने अपना ऑपरेशन मुअत्तल कर  दिया था।

बारामूला में फौज के उच्च अधिकारी इस पूरे घटना क्रम से काफी नाराज़ थे। उनका एक ही सवाल था कि आखिर सीमा पार से घुसे आतंकवादी कहां गायब हो गए।

पिछले तीन चार दिनो से कमांडर साहिब अक्सर गौतम सा इसी सवाल का जवाब मांग रहे थे।

उस दिन गौतम सुबह दफ्तर मे बैठा इसी गुत्थी को सुलझाने की कोशिश कर रहा था कि अचानक सूबेदार राजीव की आवाज उसके कानो मे गूंजी।

साहिब ऊरी से अयूब आया है। साथ मे वो पुलिस वाला मोहम्मद शफी भी है। कह रहे है कि अभी मिलना है ।कुछ ज़रूरी काम है।

ठीक है आने दो। और हमारे लिए थोड़ी चाय भी भिजवाना।

अयूब ऊर्फ मास्टर कई सालो से फौज के साथ काम करता था। 2002 में पाकिस्तान जा कर मुज्जफराबाद स्थित कैंप में ट्रेनिंग लेने के बाद उसने हिज्बुल मुजाहिदीन तंजीम के साथ तकरीबन चार साल बिताए थे। फिर एक जेहादी की खतरों भारी मुश्किल ज़िन्दगी से परेशान हो कर उसने आत्मसर्पण कर दिया था।और बस तभी से फौज के साथ काम कर रहा था। बहुत तेज़ तर्रार और होशियार था अयूब।

हां भाई इतनी सुबह कैसे आना हुआ। और आज तो साथ में पुलिस भी लाए हो।

सलाम वालेकुम जनाब। इसके पास एक अच्छी खबर है। कांस्टेबल शफी बिना कोई भूमिका बांधे सीधा  मुद्दे पर आ गया था। यही खास बात थी शफी में।

वो कई साल से सीआईडी में था। और इतने सालों में वो बारामूला के चप्पे चप्पे से वाकिफ हो गया था। गौतम के साथ तो उसकी अच्छी खासी दोस्ती थी। अपने डिपार्टमेंट को रिपोर्ट करने के अलावा वो गौतम को भी अनौपचारिक तरीके से कुछ ना कुछ काम की बात बताता रहता । हां उसके बदले अपनी कीमत भी पूरी वसूल करता था वो।

गौतम को शुरू शुरू में तो ये थोड़ा अजीबोगरीब लगा था लेकिन अब इतने सालों में कश्मीर को अच्छी तरह समझने के बाद वो जान गया था कि यहां कर काम की कुछ ना कुछ कीमत होती है। शायद हर आतंकवाद ग्रस्त इलाक़े का ये एक प्राकृतिक पहलू है।

शफी की खबर वाली बात सुनकर किसी का भी उत्सुक हो जाना स्वाभाविक था। लेकिन गौतम तो एक मंझा हुआ खिलाड़ी था। वों हमेशा ये मानता था कि इन मामलों में भावुक होने से फायदा कम और नुकसान ज्यादा होता है

उसने बड़े इत्मीनान से दोनो को बैठने का इशारा किया।

साहिब वो पिछले दिनों जो ग्रुप क्रॉस हुआ है ना।वो लच्छीपुरा के ऊपर वाले रास्ते से रफियाबाद की तरफ गया है।

अयूब ने कहना शुरू किया। ऐसा लग रहा था जैसे वो   बहुत जल्दी में है।

अच्छा तुम्हे कैसे पता।

मुझे पता है साहिब। पक्की खबर है।कल परसों बर्फ पड़ने के बाद हमारे बकरवाल लोग मवेशी ले कर जब नीचे उतर रहे थे तब उन्होंने  देखा।

अरे तो फिर तब क्यूं नहीं बताया। अब तक तो वो पता नहीं कहां पहुंच गए होंगे। पहले  पुख्ता जगह का पता करो। फिर देखेंगे।समझे।

गौतम जान बूझ कर अपनी आवाज़ में बेरूखी का रंग उड़ेल ही रहा था कि अयूब फिर से बोल पड़ा।

साहिब उन मे से एक पाकिस्तानी को चोट लगी है। उस से चला नहीं जा रहा। वो वहीं जो गब्बेवार वाला नाला है , उसी के पास रुक गया है। शायद उसके साथी उसको बाद में ले जाएंगे।

और ये भी तुम्हे उन्हीं मवेशी वाले बकरवालों ने बताया है क्या। ऐसे कैसे वो अपने साथी को अकेला छोड़ देंगे।

साहिब मै खुद देख कर आया हूं।तभी तो एक दिन लग गया।  पूछ लो इस शफी से।

अयूब और शफी की बातों में बहुत उतावलापन था।

काफी सोच विचार के बाद ये तय हुआ कि अयूब द्वारा बताई हुई जगह की तलाशी ली जाए। वैसे भी अयूब खुद फौज के साथ वहां जाने को तैयार था ही। पहले भी कई बार वो फौज के साथ ऑपरेशन  में भाग ले चुका था। कश्मीर मे ये बहुत  आम बात  है कि फौज के साथ काम करने वाले और उनको खबर देने वाले लोग रास्ता बताने और पहचान करने के लिए फौज के साथ ऑपरेशन में साथ जाते है।

गौतम ने कमांडर साहिब को सारी इतिल्ला दी तो वो काफी उत्सुक हो गए थे। इतने दिनों से आतंकवादियों के उस ग्रुप का कोई भी  सुराग नहीं मिलने के कारण वो भी काफी हताश थे।

This sounds good son . Go and get him fast.Good luck।.

उसके बाद गौतम का पूरा दिन ऑपरेशन की तैयारी करने में निकल गया था। सभी इंतजाम पुख्ता करने के बाद रात के अंधेरे में वो निकल पड़े थे लचीपोरा गांव की तरफ।

उनका इरादा था कि सुबह सुबह वहां पहुंच कर तफसील से तफ्तीश की जाए।

अयूब ने कहा था कि वो उनको लचीपोरा गांव के बाहर ही मिलेगा। गौतम ने शफी को भी अयूब के साथ रहने की जिम्मेवारी थमा दी थी।

शफी तुम इसको ले कर आ जाना । ऐसा ना हो की हम पूरी तैयारी के साथ वहां पहुंचे और ये भाईसाहब गायब हो जाएं।

नहीं नहीं साहिब । ये काम पक्का है।  देखना  मै आपको उस पाकिस्तानी तक खुद ले कर जाऊंगा।

अयूब की इस उत्साह से भरी गुहार को गौतम ने जानबूझ कर नजरअंदाज कर दिया था।

अंधेरी रात को हल्की हल्की बर्फबारी ने और ज्यादा सर्द कर दिया था। वैसे रास्ता ज्यादा मुश्किल नहीं था और  सुबह सुबह गौतम अपने सिपाहियों के साथ अपने गंतव्य पर पहुंच गया था।

अयूब भी उनके साथ था। लचीपोरा गांव के पास मिलने के बाद वही तो उनको  आगे का रास्ता बता रहा था।

थोड़ा ध्यान से साहिब। बस यहीं पास में है वो जगह।

अयूब के कहने पर गौतम ने अपने सिपाहियों को चारो तरफ तैनात कर दिया था।

अयूब का इशारा नजदीक ही एक पहाड़ी के बीचों बीच बहते एक छोटे से नाले की तरफ था। बड़े बड़े पत्थरों और घनी झाड़ियों में छुपे उस नाले को कोई अनजान आदमी ठीक से देख भी नहीं सकता था। छुपने के लिए  ये यकीनन बहुत उचित जगह थी।

फिर क्या था। किसी स्वचालित मशीन की तरह वो सब छोटी छोटी टुकड़ियां में बट गए थे ।फौज की ट्रेनिंग और तुजूर्बा इस दर्जे का होता है कि  ऐसे हालात मै किसी को कुछ ज्यादा समझाने की ज़रूरत नहीं पड़ती। गौतम के इशारों को भली भांति जानते थे उसके सिपाही।

एक टोली पास वाली टेकरी पर। एक कच्चे रास्ते के बगल में। एक नाले के नीचे की तरफ और एक टोली दूर वाली पहाड़ी पर बिना वक्त गंवाए तैनात हो गई थी।

गौतम चंद सिपाहियों के साथ नाले की ओर बड़ी सावधानी से आगे बढ़ा।

अयूब और शफी उनके थोड़ा आगे थे।

वो देखो साहिब । झाड़ी में उस बड़े पत्थर की बाईं तरफ। मैंने कहा था ना यहीं छुपा हुआ है वो।

अयूब सही कह रहा था। गौतम के सिपाही दो चार कदम आगे बड़े और थोड़ा ज्यादा ध्यान से देखने की कोशिश करने लगे।

ये सही बोल रहा है साहिब। झाड़ी के पीछे एक बंदा दिख रहा है। छुप कर बैठा है। साथ में एक पिठू भी रखा है।

हा साहिब मै तो कहता हूं यही से रॉकेट लांचर मार देते है। पास जाने का खतरा क्यूं लेना।

एनकाउंटर का मौका देख कर गौतम  के जवान जोश में आ गए थे।

अब उनको बस अपने साहिब  के हुक्म का इंतजार था।

गौतम लंबे चौड़े दरखतों की आड़ लेता हुए आगे बड़ा ।उसकी नज़रें बड़े पत्थर और झाड़ियों की तरफ टिकी थी।

हरजीत । कोई  हथियार दिख रहा है क्या उसके पास।

नहीं साहिब । हथियार तो नजर नहीं आ रहा। शायद उसने एक तरफ रखा हुआ हो।

गौतम की नज़रें वहीं टिकी हुई थी। बहुत ध्यान से देख रहा था वो ।

उसने अयूब और शफी को इशारे से अपनी तरफ बुलाया।

क्या कहते हो अयूब  मास्टर।

साहिब सोचना क्या है। देखो कैसे छुप कर बैठा है। यहीं से उड़ा देते है इस हरामी को।

अच्छा।  लेकिन हथियार तो दिख नहीं रहा उसके पास। क्यूं शफी ।

वो तो है साहिब। लेकिन हथियार दिखने का इंतजार तो नहीं कर सकते ना। और इस जंगल में ऐसे छुप कर बैठना तो हमारे  शक को और पुख्ता करता है ।वो पिठू भी तो है उसके पास।

गौतम ने थोड़ी देर सोचा और दो कदम आगे पड़ा।

अगले ही पल जो आवाज़ पहाड़ियों में गूंजी वो गोलियों कि नहीं बल्कि उस थप्पड़ की गूंज थी जो गौतम ने पूरे कस के अयूब के गाल पर जड़ा था।

शर्म नहीं आती तुम्हे। बहुत होशियार समझते हो अपने आप को।

गौतम अयूब पर अचानक ही बरस पड़ा था।

ओए नज़ीर । ज़रा पास जा कर देख । थोड़ा ध्यान से जाना मगर। और इस बदमाश को भी ले जा अपने  साथ।

मेजर गौतम के कहने पर नज़ीर और अयूब धीरे धीरे आगे बढ़े और जल्द ही उस कथित पाकिस्तानी के नजदीक पहुंच गए।

साहिब।

थोड़ी देर बाद नज़ीर वहीं से चिल्लाया।

साहिब ये तो वो बुनियार वाला पागल लग रहा है।

हां हां मुझे पता है। उसको यहां ले आओ।

गौतम को नज़ीर की बात सुन  कर ज़रा भी अचंभा नहीं हुआ था क्यूंकि उसने तो पहले ही  दूर से ही अपने मैनचेस्टर यूनाईटेड वाले लाल जैकेट को पहचान लिया था।

फिर इसके आगे कुछ कहने सुनने की ज़रूरत नहीं थी। सारा मामला बिलकुल साफ था । अयूब जान बूझ कर उस पागल को बहला फुसलाकर  उस पहाड़ी नाले में ले आया था। पूरे इलाके में ना कोई उस पागल को जानता था और ना किसी को उसके रहने या ना रहने से कोई मतलब था।

अयूब को  पता था कि फौज आतंकवादियों के नए ग्रुप की बहुत बैचेनी से  तलाश कर रही है। उसे लगा था कि एक बार एनकाउंटर हो गया तो उस पागल को पाकिस्तानी समझ कर कोई इस पर बवाल नहीं करेगा। हथियार की कमी को पूरा करने में लिए उसने एक पिठू भी वहीं रख दिया था। ठीक वैसा ही  बैग जैसा आतंकवादी आमतौर पर इस्तेमाल करते है।

शफी को भी उसने अपने साथ शामिल किया ताकि बाद में कोई मसला न बन जाए।

लेकिन ये किस्मत का खेल ही था कि वो अपनी कहानी ले कर मेजर  गौतम के पास जा पहुंचे ।

और शायद वो कामयाब भी हो जाते लेकिन गौतम ने कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई और फिर उसने अपनी पसंदीदा जैकेट को पहचान कर उनके पूरे प्लान पर पानी फेर दिया।

शाम को गौतम और उसके सिपाही थकहार कर  बारामूला में वापिस आ गए । आमतौर पर तो किसी ऑपरेशन में अगर कोई आतंकवादी मारा या पकड़ा ना जाए तो वो ऑपरेशन नाकामयाब माना जाता था लेकिन आज गौतम को इस नाकामयाबी का कोई अफसोस नहीं था।

रोज़ की तरह उस शाम  को भी  सिमरन ने उसे फोन किया था।

कहां हो जनाब । कल रात से फोन आउट ऑफ रीच है। खाना खाया या नहीं। बर्फ बारी शुरू हो गई ना । कितनी बर्फ पड़ी है।

हां हां थोडा  ज़रूरी काम था। बस अभी वापिस आया हूं।

अच्छा सिम सुनो । वो लाल जैकेट था ना।

अरे यार ।तुम अब तक उस जैकेट के पीछे पड़े हो। वो तो तुमने किसी को दे दिया था ना। अगली बार छुट्टी आओगे तो एक और ले लेंगे। और यहां बंगलौर में थोड़े दिन पहले ही मैनचेस्टर यूनाइटेड का आउटलेट और कैफे खुला है। you will love it.

अरे पता  है। आज उस जैकेट के कारण एक इन्सान की जान बच गई।

गौतम ने सब कुछ बताना शुरू किया और फिर बहुत  देर तक सिमरन बस चुप चाप सुनती रही।

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ENGLISH TRANSLATION

“Are you are not feeling sleepy? “

Major Gautam asked this question, to the two soldiers sitting inside the white gypsy with
him. They enthusiastically answered in unison “No, sir.”

But soldier Nazir Ahmed hesitated, and responded” Sahab, it has become habit to march with you early in the morning. Initially, I used to get very sleepy, but not
anymore.”

 

“Yeah… it’s ok to indulge in some aashiqui, you will
never sleep again.”

This dialogue by the Major Sahab, had everyone splitting
their sides , including the driver Ravi. They laughed and moved on.

Major Gautam, made everyone around him very comfortable—this
was the reason he was liked by all. He was good to his soldiers and his seniors
alike, at the same time, he ensured everyone performed well. These might appear
to be simple things but in a military unit it plays a huge role in the success
of operations, especially in the valley.

It was around five in the morning that day. The beautiful
plains of Kashmir were just waking up to the winters.

Usually the city of Baramulla is abuzz during the day but
early in the morning the place is dead like a dodo. Major Gautam’s unit was
stationed at the old Baramulla town since last few years. The responsibility of
maintaining peace in this city was on the young major’s shoulders and he didn’t
let the Army down.

On some days he would carry out operations against the
terrorists, on other days he would ensure he went around to mingle with the
locals. This helped the organization get the support of the locals.

Whenever Gautam had to go to the neighboring areas, he would
leave in the morning. Today he intended to go to Uri. Under normal
circumstances it takes about two hours to get to Uri from Baramulla, but due to
lack of traffic early in the morning, this journey would end in an hour.

The route from Baramulla to Uri appeared unusually beautiful
that day. The dense forest nestled in the womb of the high hills, the clouds
drifting slowly with the cold winds and amidst this Jhelum River flowing along
the highway, was a scene that had enticed Major Gautam.

Often on this route, as his gypsy would ply on the road,
Gautam imagined a race between his vehicle and the Jhelum. This is how he would
spend his road trip—a childish idea of recreation, he would remind himself. Gautam’s
gypsy could only go up to the city of Uri but the river, Jhelum, would continue
to flow with the same enthusiasm as it crossed the border, and reached
Pakistan.

Meanwhile Gautam’s two companions had their eyes on the
bushes and trees along the road. You never know when a terrorist hiding by the
road side might lobe a grenade at you. Though army’s Road opening party (ROP)
ensures security of the soldiers who commute between different places in the
valley, but ROP comes into action after it dawns.

 

During the wee hours, Gautam and his companions had to be
very careful.

Boniyar was located close by– the small town which remained
peaceful, during the peak of terrorism in the valley. Locals maintained a
friendly relation with the Army.

                                                           Boniyar

But everyone knew that being close to the Line of Control,
the terrorists who infiltrated from Pakistan entered the Kashmir Valley via Uri
and Boniyar. For the same reason terrorists avoided attracting any attention to
this area.

Bhai, slow down. At this speed we might end up in
the hospital, instead of Uri”, Major Gautam’s driver chuckled as he heard the
orders from his sahab.

Just then Gautam spotted a little movement in the bushes
along the road. He suspected that there might be someone hiding.

At Gautam’s behest, Ravi slowed down the car and the
officer’s trained eyes scanned the area.

He then saw a human figure sitting under a tree with a thick
trunk. There was no way any sane person would be out so early in the morning,
just to rest by the tall trees. Not in Kashmir!

“Nazir, go check who is it under that tree? And if he’s
carrying any weapon?”, Major Gautam tasked his man. “Take care”—he instructed
his soldier.

Nazir being an experienced soldier, walked cautiously
towards the tree, and then returned immediately. 

“That man is a pagal (mentally ill), he’s
definitely not in his senses. Only God knows why is he sitting there.”—Nazir
reported back to his officer.

Nazir was a resident of the same area. He could recognize
locals living in the area even if the light was dim.

The man under the tree was disheveled, seemed very weak and
poor.

He kept staring silently at Nazir as he was being inquired
about his background. With his dirty hair and unkept long beard, Nazir realised
the man was definitely not a terrorist.

Major Gautam, could not help but pity the man sitting under
the tree.

Gautam had a habit of keeping extra clothes and food in his
car because sporadically he would be required to stay back at the places of
operation longer than usual. He preferred to stay prepared for all
eventualities like a soldier.   

Following his officer’s orders, Nazir handed the old man
whatever Major Gautam gave him.

Ravi started the car, and they moved on.

A little later Nazir, mustered the courage to speak to Major
Gautam “Sahab, don’t mind, we should not stop by the roadside. It is perilous;
we can be ambushed”.

Gautam smiled ear to ear after he heard Nazir’s advice.
Nazir was not wrong, in the past many such ambushes by terrorists have taken
place along the road side. Being a local, he knew the place well—that he did
not even trust his own people, the thought made the major smile to himself.
Kashmir—which was once upon a time called heaven on earth, had become hell for
Kashmiris because of terrorism.

“You ‘re right Nazir, we have to be careful. Though we
stopped at that place only after carefully scanning the area”.

Soon they reached Uri. The situation was a tense in those
days. A few months ago, some terrorists had infiltrated from Pakistan, and
managed to sneak into a military camp. The cowards set fire to tents where
scores of soldiers were sleeping. Many soldiers lost their lives that day.

Since then the line of control was mostly hot, with both the
sides firing at each other incessantly. The Pakistani Army, often used the
opportunity to give cover firing, to facilitate infiltration.

It was for the same reason that Major Gautam was sent to
Uri—to prevent the terrorists from crossing the border, before the snowfall
blocked the paths treaded by the terrorists.

People in the small town of Uri had no qualms in cooperating
with the Army, in return they received money and ration. Most of them would
work as informers—while some would do this very diligently, others would dupe
the officers who were new to the place, with fake information.

As soon as he reached Uri, Gautam ensured he met his old
acquaintances in the place. His mobile had also been buzzing.

“Hello, did you reach? Why did you not call me? I have been
trying to contact you since long. Is it cold there? Did you eat anything?”

Gautam could not help but laugh at the volley of questions
thrown his way.

This is how they had been since the time they met, Simran
would call him and Gautam would almost always forget to call her back. But he
liked it this way—getting rebuked by Simran. It strengthened their bond, or so
he believed.  

“Hey Sim, do you remember the red jacket?”

“Oh yes, the Manchester united jacket. Is that the one
you’re talking about?”

 “Yes, I gave it away
to a man who was sitting by the roadside.”

“Gosh! Do you plan to be the next Mother Teresa? Kamaal
ho yaar
!

But then it’s okay. Your favourite team, Manchester united,
is getting beaten black & blue by the Liverpool team these days.”

Ideally, that taunt about his favourite team would have
irked Gautam, but that day it brought a smile on his face. Simran had no
interest in football, till she met him. Love transforms everyone!

 

Gautam spent that day in Uri, and by evening he was back in
Baramulla. He had an inkling that this was the silence before the
storm—terrorists must be waiting for an opportunity to cross over.

He was right—one of the unit stationed near the LoC reported
that patrolling soldiers found a section of the wire in their area tampered.
Someone had cut a portion of it.

It was the duty of the units stationed along the border to
regularly check the boundary wires. A double-row of fencing and
concertina wire is part of the barrier constructed by India along the LoC,
in 2001. These wires act as “fast alert signals” to the Indian troops
who can be alerted and ambush the infiltrators trying to sneak in. But a wire
found cut, would mean that terrorists have already infiltrated into our soil.
Albeit, the location where the wire is tampered with, gives a good idea of
which direction the terrorists must be headed in. This usually leads to a
search operation that fructifies into a successful operation when the
terrorists are eliminated.

As soon as Gautam received the report, he alerted his team.
And then they began nudging their sources for information.

But this time the luck favoured the terrorists, there was no
information on them as the days passed.  Adding to the woes of the Army
was, the snow that had begun to cover the peaks in the area.

This was definitely not going down well with the higher ups
of the establishment. Gautam’s commander and he himself were under pressure to
locate the terrorists.

A team was dispatched to Lacchipura village, after someone
spotted a few footprints in the snow. But the operation lead to zilch.

The next day morning Gautam was trying to dig more
information from his sources when Subedar Rajiv informed him “ Sir Ayub has
come and he’s accompanied by a Policeman, Mohammed Shafi. They want to meet
you.”

“Alright send them in and please serve them some tea.”

Ayub aka Master, was a terrorist earlier. In 2002 he had
gone to Pakistan and was trained in the terrorist camp located in Muzaffarabad.
He was inducted into terrorist organization Hizbul Mujahideen. But after 4
years as a terrorist, he surrendered to the forces. Since then he had been
cooperating with the Army, and to the establishment he was an asset due to his
capabilities. He was a sharp man.

 

Haan bhai Ayub, how are you doing? And how come you
decided to visit us early in the morning with a Policeman?”, Major Gautam
asked.

The Policeman accompanying Ayub was constable Shafi who had
been part of CID, the plain clothed detectives. He was well versed with
Baramulla and would often pass on important information to Major Gautam. But he
ensured he was paid well in return of the favour, something that initially made
Major Gautam very uncomfortable, but now Major Gautam knew the drill. He
realized this is how things work in Kashmir—everything has a price tag. Prolly
this rule was applicable to every terrorist ridden place, Major Gautam had
concluded.

Major Gautam though was curious to know what information the
2 men were about to give him, but he ensured his impatience and curiosity did
not reflect in his body language. Over the years Major Gautam had realized that
emotions can water down the efforts put into an operation.

But Ayub was definitely in a hurry this time—“Sahab the
terrorists who had crossed over to India few days ago have moved to Rafiabad
via Lacchipura.”

 

Accha, but how do you know this?”, Major Gautam
enquired.

“I know it Sahab.2-3 days ago, a few Bakarwals (a nomadic
tribe) had passed on the information to me”.

“Why did you not inform me about it immediately? By now the
terrorists must have moved to a different location. Confirm their new location
and then we will move.”, Major Gautam intentionally wanted to sound irked by
Ayub’s information.  

Ayub added some more information “Sahab, one of them is a
Pakistani and apparently injured. He can not walk and seems to have taken
shelter close to Gabbewar nalah. His teammates might take him with them
later”.

“How is that possible? Why would they leave behind a
teammate? Did the Bakarwals tell you this?”.

 

“Sahab, I went and checked it myself and this is the reason
it took me a day to confirm things, before I could pass on the information to
you”.

Major Gautam ruminated over it and then decided to go ahead
with the operation. Ayub was going to accompany the team, like he usually did.
Informers accompany teams during such operations to help the soldiers identify
the location and the person.

“This sounds good son. Go and get him fast. Good luck! “—Gautam’s commander allowed him to carry out the operation.

The officer spent rest of his day preparing for the operation. At night the team left for
Lacchipora village. Major Gautam had instructed constable Shafi to bring Ayub
along and meet them at Lacchipoora.

Ayub had confirmed “Sahab I will lead you there myself.”

By night it had begun to snow, and carrying out an operation under such condition is a
little difficult.

Major Gautam and his team, along with Shafi had reached their destination.

The team had taken it’s position.

Ayub then pointed to a narrow nalah hidden between the boulders, and bushes. Definitely an ideal location for a terrorist to hide.

Major Gautam’s team, soon began to move forward to the location pointed by Ayub.

The training imparted to the soldiers within the establishment is such that most of them
know their role pretty well. They divided themselves into 4 groups. One group
moved to the tekkri (a
helmet shaped feature), the 2nd group moved close to the nalah, the 3rd
group took position near the kachha road and the 4th team moved close to the hill without wasting time.

Ayub and Shafi had also accompanied them. Ayub pointed towards a bolder and said “ look at that sahib, I told you, he is hiding there behind the bushes”. Gautam and few
of his team members moved closer to the bolder.

They could now see things more clearly.  One of the soldiers in the front confirmed “yes
sir, he’s right. There’s a man hiding there and he has a backpack with him”.

An opportunity to carry out an operation always thrills the soldiers. They were eagerly
waiting for further orders. Gautam decided to make a few final checks—“Is he
carrying a weapon?”.

“No sahab, there’s no weapon. He might have kept it on the other side, and may be that’s
why it’s not visible to us”, the soldier reported back.

Gautam called Ayub and Shafi by his side, asked Ayub once more “ Ayub master, what do you say?”.

“It’s confirmed sahib, he’s a terrorist. Shoot the harami
down”, Ayub said.

“But I don’t see any weapon”, Gautam was still apprehensive.

“He must be having it Sahab, it’s not visible to us. His backpack proves he’s carrying a
lot of stuff”.

Gautam stepped forward, to take one final look at the man hiding behind the bolder and then a sound reverberated through the silence–the sound of a tight slap on Ayub!

“You shameless creature, you think you can dupe us?”, Major Gautam thundered at
Ayub.

“Oye Nazir, go take a closer look at that man, and take this man along”, Major Gautam pushed Ayub forward.

Nazir obediently followed the instructions of his officer—“Sahab this is the same pagal we had spotted near Buniyar”.

“Yes… I know”, Major Gautam muttered, he had recognized the mentally ill man as soon as he had spotted the man in Manchester United’s jacket hiding behind the bolder.

Now it was as clear as a bright day that it was Ayub’s ploy to make money out of the
operation. He had brought the mentally ill man to the area, and handed him a
backpack just like the one carried by terrorists, to make up for the missing
weapon. Ayub was aware Army was desperately searching for the terrorists. Since
no one knew the mentally ill man in the area, nobody would have bothered to
check his antecedents and he would have been declared a Pakistani terrorist—or
so Ayub had thought. But he was mistaken.

Ayub had ensured that nobody suspected him, and this is the reason he had got the
Constable, Shafi, involved.

The pagal, was definitely lucky, Major Gautam thought to himself, or else Ayub would not have approached the officer with his story. His favourite red Manchester jacket was not difficult to spot from miles away.

By evening Major Gautam and his soldiers returned to their den in Baramulla. It was a
tiring day, and under normal circumstances the operation would have been called
a failure. But not his time. Major Gautam knew deep in his heart that this was
a successful operation.

As always, Simran’s name flashed on Major Gautam’s mobile and it began to buzz.

“Where are you Janab? Your phone was switched off last night. Did it snow there? How thick is it?”—Simran in her usual style began her interrogation.

“Listen Sim, remember that red jacket?”

“Arrey yaar, yes I remember, you gave it away to someone. You know just a few days ago Manchester United opened
it’s first outlet here in Bangalore, and there’s a café too. You will love it”.

“You know that jacket saved a man’s life today.”—Gautam’s voice interrupted Simran.

And then Gautam began to tell the story, as Simran listened…

 

 

 

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